टीम नीतीश कुमार की पीएम को चेतावनी, नोटबंदी को समर्थन की ‘एक्सपायरी डेट’ भी है

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103503-101860-98910-nitish7-1पटना: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने रुख को लेकर बिल्कुल साफ हैं कि वह नोटबंदी के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिए समर्थन को अचानक वापस नहीं लेंगे. इसी सप्ताह की शुरुआत में नीतीश कुमार ने कहा था कि वह 500 तथा 1,000 रुपये के नोटों को अचानक बंद कर काले धन को खत्म करने के लिए ‘सिर्फ 50 दिन’ तक सब्र करने के प्रधानमंत्री के आग्रह का सम्मान करेंगे. प्रधानमंत्री की इस पहल का उसके इरादे को लेकर चौतरफा स्वागत किया गया, लेकिन लागू किए जाने पर इसकी नाकामी भी सामने आई, क्योंकि एक महीना बीत जाने के बावजूद देशभर में अभी तक भारी नकदी संकट बरकरार है.

नीतीश कुमार ने मंगलवार को कहा था, “मैं उस किस्म का शख्स नहीं हूं, जो जल्दबाज़ी में किसी का समर्थन करूं, और फिर वापस ले लूं… 30 दिसंबर तक इंतज़ार कीजिए, और फिर हम विश्लेषण करेंगे…”

उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) का एक धड़ा इस बात से नाखुश है कि जिस वक्त संसद में 15 विपक्षी दल एकजुट होकर सरकार पर अर्थव्यवस्था को खतरे में डालने तथा गरीबों व ग्रामीण भारत को नकदी संकट में धकेलने के आरोप में कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, उनकी पार्टी नोटबंदी का समर्थन कर रही है.

गुरुवार को दिल्ली में केंद्र सरकार को सीमित समय की याद दिलाते हुए जेडीयू नेता पवन वर्मा ने कहा, “जिस लक्ष्य को सामने रखकर यह कदम उठाया गया था, क्या यह उसके काम आया…? इसलिए हम 30 दिसंबर तक इंतज़ार कर रहे हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा था, ’50 दिन इंतज़ार कीजिए, सब कुछ सामान्य हो जाएगा…’ सो, यही हमारा रुख है…”

काले धन को बाहर निकालने और उसे रखने वालों को दंडित करने के इरादे से नोटबंदी की अचानक घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री ने भावुक लहजे में देशवासियों से 50 दिन तक सब्र रखने का आग्रह किया था. तय किया गया था कि बंद किए गए नोटों को 30 दिसंबर तक बैंकों में जमा करवाना होगा. अब तक 80 फीसदी नोट अब तक जमा किए जा चुके हैं, जिससे संकेत मिलता है कि लगभग सारे ही नोट बैंकों में वापस आ जाएंगे.
बंद किए गए नोट देशभर में प्रचलित सारी मुद्रा का 86 फीसदी हिस्सा थे, और उन्हें बंद किए जाने की वजह से जो भारी किल्लत पैदा हुई, नए नोटों से उसकी भरपाई बहुत कम हद तक की जा सकी.

राजनैतिक अतीत में नीतीश कुमार के ताल्लुकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अच्छे नहीं रहे हैं, सो, जिस समय उन्होंने ज़ोर देकर प्रधानमंत्री को समर्थन का ऐलान किया, और यहां तक कहा कि पीएम ‘बहादुरी से शेरसवारी कर रहे हैं’, सभा हैरान थे, लेकिन विश्लेषकों के अनुसार उसकी वजह कुछ हद तक यह मान्यता थी कि ढेरों परेशानियों और दिक्कतों के बावजूद जनता ने प्रधानमंत्री के उस वादे पर यकीन कर लिया है कि ‘कुछ समय तकलीफ बर्दाश्त कर लेने से आगे चलकर फायदा होगा…’

उनकी पार्टी के भीतर हो रहे नोटबंदी के विरोध से भी ज़्यादा परेशानी उनके लिए तब खड़ी हुई, जब राज्य सरकार में उनके सहयोगी लालू प्रसाद यादव ने अपने जाने-पहचाने तुनकमिजाज़ अंदाज़ में नोटबंदी की आलोचना की. नोटबंदी को लेकर उनके मतभेदों में उन दरारों को चौड़ा कर दिया, जो उनकी साझेदारी में पहले से बनी दिख रही थीं. यह दरार कितनी बड़ी हो गई, इसका अंदाज़ा इस बात से लगायया जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी के नहीं, लालू प्रसाद यादव की पार्टी के विधायकों को बंद दरवाज़े के पीछे संबोधित करते हुए आश्वस्त किया कि नोटबंदी को उनका समर्थन भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की तरफ लौटने के लिए उठाया गया कदम नहीं है, जिसके साथ वह लगभग दो दशक तक गठबंधन बनाए रहे थे.

अब जब नीतीश की पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रधानमंत्री को दिए गए समर्थन की ‘एक्सपायरी डेट’ भी है, लालू प्रसाद यादव ने शनिवार को अपनी पार्टी की बैठक बुलाई है, जहां वह नोटबंदी को लेकर पीएम के खिलाफ सड़क पर प्रदर्शनों की योजना को अंतिम रूप देंगे.

इस बीच, बीजेपी ने लगभग साफ-साफ नीतीश के समर्थन को बनाए रखने की कोशिश की है. पार्टी के मंगल पांडेय ने कहा कि अगर नीतीश कुमार नोटबंदी पर रुख बदलते हैं, तो उसे ‘लालू के सामने झुकना समझा जाएगा..

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