लखनऊ :- ” गहवारा-ऐ-अदब “

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(Photo by : Ali Hasan)

लखनऊ अदब, तहज़ीब और इल्म का गहवारे की तरह पूरी दुनिया में मशहूर है और इसी तहज़ीब और शराफ़त के चलते यहाँ के लोग बहुत ही खूलूस औरमुहब्बत के साथ अपने क़राबतदारों, दोस्तों और बुजुर्गों से मिलते है।अहले लखनऊ की “पहले आप” की तहज़ीब ये बताती है के ये खुद से पहले दूसरों को तरजीह देते हैजोसिर्फ इनकी शराफ़त ही नहीं बल्कि ये इनके इल्म को भी खूब बयान करती है, लखनऊ के कुछ खानवादे तो अपने इल्म से इस पूरी दुनिया में खासा नाम कमा चुके हैऔर कमा रहे है, शुआरा और अलिमों के इस शहर का आज भी कोई सानी नहीं है।

यहाँ की क़दीमी जुबान उर्दू है, जो असल में लश्करी जुबान में शुमार होती थी के जिसकी चाशनी से पूरा मुल्क मुन्नावर होता है, इसकी शीरीनी नें इसे आज भी हर दिल का अरमान बना दिया हैऔर इसी जुबान ने ही यहाँ की शराफ़त और मोहब्बत भरी फिज़ा को बरक़रार रखा है।

सालों पहले की तरह आज भी यहाँ सभी मज़ाहिब के लोग मिल जुल कर दीवाली और ईद मनाते है, जो अपने इस शहर की बरसों पुरानी गंगा जमनी तहज़ीब को पेश करते है। इस इत्तेहाद का नमूना आज भी लखनऊ के कई हिस्सों में देखने को मिल जाता है, आज भी यहाँ का एक  हिन्दू बाप अपने मुसलिम बेटे को ठीक उसी के रिवाजों से पालता है, आज भी यहाँ के मुसलिम अपने हिंदू भाईयूं को दीवाली की मुबारकबाद देते है और साथ में होली खेलते है वही दूसरी तरफ ईद में सब गले मिल कर मानो एक दूसरे से अपने दिलों को जोड़ लेते है।

अगर यहाँ की इमारतों की बात की जाए तो यहाँ की नायाब और आलीशान इमारतें उस वक़्त के बेहतरीन हुकूमती निज़ाम को पेश करती है, इन आलीशान इमारतों के बनवाने का मक़सद अपनी शान ओ शौकत दिखानें से ज्यादा मुआशरे का ध्यान देना था, उन्हे रोज़ी-रोज़गार से लगा कर उस वक़्त फैली भूकमरी और गुरबत को मिटाना था, साथ ही साथ इन इमारतों पर की गई बे-मिसल नक्काशी और कारीगरी आज भी उस ज़माने के कारीगरों की महारत और नज़ाकत को साबित करती हैके किस तरह आराम से और बारीकी से उन्हे तराशा और सवारा गया था जिसके असरात आज भी अयां है।

लिबासेलखनऊ भी अपने में बे-मिसल और ला-जवाब है, अहले-लखनऊ अपने लिबास को भी उसी नज़ाकत और नफ़ासत से पहेनना पसंद करते है के जैसे बाक़ी चीजों को, इनके लिबास साफ और शफफफ होने के साथ साथ अपनी जुबान से लखनऊ की तारीफ़ करते नहीं थकते है, चिकन, जरदोज़ी और कामदानीकिए हुए कुर्ते, साड़िया और दीगर लिबास पूरी दुनिया में लखनऊ को हर दिल अज़ीज़ बना देते है वहीं दूसरी तरफ़ यहाँ के फन-कार जिस वक़्त अपने हाथों का जादू कपड़ों, बर्तनों और ज़ेवरात पर चलाते है उस वक़्त वो चीज़ मानों जिंदा हो जाती है और अपनी दी गई जुबान से लखनऊ की खूबसूरत कारीगरी की तरीफ़े शुरू कर देती है।

1795476_612084098845539_1586450607_nअब अगर लखनऊ का नाम आ ही गया और यहाँ के खाने का नाम न लिया जाए तो लखनऊ पर ज़ुल्म हो जाएगा, लखनऊ में जिस नफ़ासत से खाना पकाया जाता है उतने ही खूलूस के साथ उसे खिलाया भी जाता है। मेहमान नवाज़ी के लिए तो अहले लखनऊ खुसूसन मशहूर है, अहले लखनऊ खाना खिला कर सिर्फ लोगों के शिकम को ही नहीं बल्कि उनकी नियत को भी सेर कर देते है।शाम के सूरज के ढलते ही यहाँ के ताज़ा और जाएके-दार खानों की खुशबू पूरी फिज़ा को इस तरह रोशन कर देती है के इंसान अपने को इन से दूर नहीं रख पाता है फिर उसे मजबूरन ये कहना ही पड़ जाता है के “लखनऊ हम पर फ़िदाऔर हम पर फ़िदाए लखनऊ”

(प्रो.अली मेहदी नकवी)

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